परिंदे हो तुम

परिंदे हो तुम खुले गगन के ।
भर दो सहज उन्मुक्त उड़ान बिना डोर के
स्वपरो से उड़कर रंग दो अपने निशान
पंछी हो तुम खुले गगन के….
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livepathshala परिंदे हो तुम
छोड़ अपने उस निराश मन को
भर आशाओ से अपने तन को
मुड़-मुड़कर ना देखो गम को
नाकामियो को भूल सदा ही कामयाबियों को सहज बना दो
पंछी हो तुम खुले गगन के…
  Written by
IMG-20160717-WA0006  Deepesh  Kumar  Sharma
Deepesh  Kumar  Sharma is  a  writer (relative to natural lusture)  he is persueing B.Sc. (computer science) from P.M.B.Gujrati Science College Indore (M.P.).  
 

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