by bhagwati prashad kulshrest

वह लड़की – भगवती प्रसाद कुलश्रेष्ठ जी की रचना

वह लड़की – भगवती प्रसाद कुलश्रेष्ठ जी की रचना …. ।
by bhagwati prashad kulshrest
जानकर मन थरथराया
और तन था कँपकपाया
एक लड़की जल रही थी
त्ंदूर से लौ उठ रही थी
कौन उसकी व्यथा सुनता
कौन उसकी कथा गुनता
हर ओर उसके भेड़िये थे
इंसान कोई भी नहीं था
और वह लड़की न ऐसी निरीह ही थी
व्यक्तित्व था उसका प्रभावी
थी रही शिक्षित बहुत ही
रूप में भी कम नहीं थी
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नक नक्षें बहुत तीखे
अंग उसके फूल जैसे
रंग उसका चाँदनी-सा
दंत उसके मोतियों से
केश श्यामल घन सरीखे
यूँ रही नैना सुनयना
चहती थी बहुत कुछ होना
मिल गये साथी
उसी के ही तरह के
बहुत उत्साही हम उमर के
हर समय ही साथ रहते
हर जगह ही काम देते
था उसे उन पर भरोसा बहुत भारी
मगर मन से अधिक तन था
भा गया उसका उन्हें तो
गिद्ध जैसी दृष्टि लग गई तन पर
चाहते थे नोच खाना बोटियों तक
इसीलिए ही प्रेम का नाटक गया खेला
और शादी भी रचाई
माँग सिंदूरी सजाई
बँद गई वह उस लता-सी
मजबूरियों में
जो चढ़े इस डाल पर भी
उस डाल पर भी
खेल ऐसा जो चला
अंत उसका था जरूरि
और यह वीभत्स परिणित
देखते सब रहे गये थे
साँस सबकी थम गई थी
सोचने को हो गये मजबूर
क्या नियति का है यही दस्तूर
आज भी नारी
वही शोषित! वही पीड़ित ! वही भोग्या ! वही दासी
वही अबला, न जिसका हल कभी निकला

Written by

bhagwati murena   भगवती प्रसाद कुलश्रेष्ठ  

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