शिक्षित बेरोजगारों का भरपूर फायदा उठाते हैं निजी विद्यालय

शिक्षित बेरोजगारों का भरपूर फायदा उठाते हैं निजी विद्यालय

शिक्षा का क्या मूल्य है, शिक्षा का क्या मान

शिक्षक का है छिन गया, सारा स्वाभिमान||

एक समय था जब गुरु को ईश्वर से भी महान माना जाता था | गुरु का स्थान और सम्मान समाज में सर्वोपरी था | लेकिन अन्धकार से प्रकाश की और ले जाने वाला वो गुरु आज स्वयं अपने जीवन और भविष्य को अन्धकार में देख रहा है| जी हाँ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्राइवेट विद्यालयों के शिक्षकों की दशा अत्यंत दयनीय है |

आज पढ़े लिखे बेरोजगार युवा अपना शोषण करवाने के लिए मजबूर है जिसका पूरा-पूरा लाभ शिक्षा का व्यवसायीकरण देने वाले व्यवसायियों द्वारा उठाया जा रहा है |

ये व्यवसायी शिक्षा का व्यवसायीकरण कर एक तरफ जहां अभिभावकों के जेब में डाका डाल रहे है। वहीं दूसरी तरफ शिक्षित बेरोजगारों का शोषण कर रहे है। कुकुरमुत्ते की तरह गली गली में खुले शैक्षिक प्रतिष्ठानों में न तो कमरे मानक के अनुरूप है और न ही सुविधा। विद्यालय तंत्र द्वारा केवल फ़ीस वसूली के विभिन्न तरीके खोजे जाते है। जिनसे अभिभावकों को ठगा जा सके। अपनी पहुंच और पकड़ के कारण शासन स्तर पर विद्यालयों को न्यूनतम मजदूरी दर से बाहर रखा गया है।

जहां पर कार्यरत कर्मचारियों को मिलने वाली रकम का किसी भी प्रकार का निर्धारण नहीं किया गया है। कई विद्यालयों में तो शिक्षकों को मुर्ख बनाने और सरकार को चुना लगाने के लिए बाकायदा सरकारी बैंकों में खाते खुलवाये जाते है और उनमे पैसा भी जमा करवाया जाता है लेकिन शिक्षकों को पारिश्रमिक क्या दिया जाता है इन दोनों में बड़ा अंतर है |

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि शिक्षित वर्ग का सबसे ज्यादा शोषण हो रहा है और शिक्षित वर्ग शोषण करवाने के लिए मजबूर है, जिसमे प्राइवेट विद्यालय सबसे आगे है| एक अनुमान के मुताबिक टीचरों को डेढ़ हजार से लेकर 12-15 हजार महीने मिलते हैं। इतने कम मजदूरी में शिक्षकगण प्राइवेट विद्यालयों में कल के भविष्य को शिक्षा देते हैं।

शिक्षकों को विद्यालय में रखने का कोई नियम कानून नहीं है। प्रबंध समिति जब चाहे शिक्षकों की भर्ती कर लेती है और जब चाहे पुराने को निकाल बाहर कर देती है। वेतन के कोई मापदंड नही है जितने में सौदा पट जाए ! योग्यता का कोई अर्थ नही है|

विशेषकर ऐसे शिक्षक रखे जाते है जिन्हें कोई अनुभव नही होता जिससे की उन्हें कम से कम वेतन में रखा जा सके इन विद्यालयों में वार्षिक वेतन वृद्धि की भी कोई पोलिसी नही है और न ही सरकार द्वारा प्राइवेट शिक्षकों के भविष्य के लिए कोई योजना या नीति बनाई जाती है |

यह सच्चाई है प्राइवेट विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक- शिक्षिकाओं की, जहां हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद टीचरों को श्रमिकों वाली न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिलती है।

इन टीचरों का कहना है कि उनसे अच्छे मजदूर होते हैं जिनको उनसे ज्यादा मजदूरी मिलती है और वो लढ़ झगड़ कर अपनी मजदूरी प्राप्त भी कर लेते है जबकि शिक्षक अपने वेतन का इंतजार करता रहता है और बार-बार अपने आत्मसम्मान को ताक पर रखकर उन व्यवसायियों से वेतन की गुहार लगाता रहता है ।

शिक्षकों के शोषण करने में किसी एक या दो संस्थानों का नाम नहीं लिया जा सकता है बल्कि सभी विद्यालयों में शिक्षकों का भरपूर शोषण किया जाता है। टीचरों की माने तो प्रबंध समिति छुट्टी वाले दिन भी शिक्षकों को विद्यालय में देखना चाहती है या तो फिर काम ही इतना बढ़ा देती है की शिक्षक बेचारा घर बार सब छोड़कर अवकाश दिवस में भी काम पर लगा रहता है|

समाज का पढ़ा लिखा तबका शिक्षक वर्ग अपने साथ हो रहे व्यवहार से खिन्न है। जिस शिक्षक के स्वयं के भविष्य का कोई ठिकाना नही है ऐसी खिन्न मानसिकता वाला शिक्षक किस प्रकार के राष्ट्र का निर्माण करेगा ये विचारणीय एवं सोचनीय प्रश्न है |

 

written by

pankaj prakhar

Pankaj prakhar 

पंकज “प्रखर” 
लेखक एवं वरिष्ठ स्तंभकार
*कोटा (राज.)*
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