BACHPAN PRIYA SHRIVASTAVA

बचपन

बचपन की बात है, प्यार से सब उसे “कालू” बुलाते थे | लेकिन नाम उसका बहुत खूबसूरत था “ओमप्रकाश” लेकिन बुद्धि और रूप  एक दम विपरीत, मोटा शरीर काला  रंग और औगल नंबर का बदमाश, किसी का कुछ भी छीन के खा जाना किसी को थप्पड़ लगा देना, हरकत तो ऐसी थी मानो सारे लोग उसके गुलाम हो, शायद इसी स्वभाव के वजह से लोग उसे कालू बुलाते थे |

“खुशबु ” का दुर्भाग्य की वो कालू की परोसन थी, स्कूल जाने से लेकर घर पे खेलने तक “कालू” और उसके तीन और भाई – बहन खुशबु साथ ही रहते थे, “खुसबू” नेचर की शांत और सरल स्वभाव की थी  लेकिन उसका सुन्दर होना “कालू” और उसके भाई- बहन के आँखों में  चुभता था, वो बहुत गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थीे|

लेकिन उसकी माँ की ख्वाइस थी की वो पढ़े, उसके पिता दिल्ली में धागा फैक्ट्री में काम करते थे पढ़ा लिखा न होने के वजह से तनख्वाह बस इतनी थी अपना और परिवार का पेट पाल सके इसलिए खुसबू हर परिस्थिति में पढ़ना चाहती थी ताकि वो अपने परिवार का भविष्य संवार सके|

“खुसबू” जब भी स्कूल जाती उनके साथ ही जाती, जाते समय सब ठीक होता, खुसबू “कालू” के ही क्लास में पढ़ती लेकिन उम्र में वो 3 महीने छोटी थी इसलिए कालू चाहता था की  खुसबू  उससे छोटी क्लास में पढ़े, लेकिन बहुत ही तेज विद्यार्थी थी इसलिए कोई कालू की बात पे ध्यान नहीं देता, क्लास में गृहकार्य कर के जाना, टीचर्स का सम्मान करना, कम बोलना ये सब खुसबू का स्वभाव था इसलिए स्कूल में सभी उसे बहुत प्यार करते थे|

लेकिन इन सब बातो से कालू को जलन होती थी और वो इसका बदला स्कूल से लौटते समय रोज़ लेता था,कभी उसके बाल नोच देता कभी बैग की साडी किताबे रोड पे फेक देता उसे मारताे|  आती हुई बस क सामने धक्का देता, हद तो तब होती जब कालू उसके स्कूल ड्रेस पे स्याही या कीचड़ का दाग लगा देता, और सभी बच्चे खुसबू की मदद करने के बजाय उसपे खूब हसते, सुबह हसते हुए जाने वाली खुसबू रोज़ शाम को रोते हुए आती, और जब भी खुसबू की माँ ये सारी बाते, कालू की माँ को बताती वो बोलती की “क्या बच्चो की बात ले के बैठ गई छोरो न बैठो चाय पिलो” ऐसा लगता जैसे उन्हें कोई फर्क नहीं परता की उनके बच्चे ऐसे है, तंग आकर खुसबू अकेली स्कूल चली जाती लेकिन छुट्टी तो साथ में ही होती थी फिर वो और भी परेशान करते “खुसबू डरपोक है” कहकर जोर जोर से सड़क पे नारा लगाते, स्कूल से घर तक के रस्ते में एक छोटी सी नदी मिलती थी जिसे गांव में नहर कहते हे|

एक दिन कालू ने खुसबू को नहर में धक्का दे दिया और पानी ज्यादा  होने के कारन  वो तैर नहीं पाई,  वो डूबने लगी तब सभी बच्चे डर कर शोर मचाने लगे, एक चरवाहे ने नहर कूद कर खुसबू की जान बचाई, ये हादसा उन्हें डरा दिया और खुसबू की माँ ने उसे स्कूल जाने से मना कर  दिया उसकी पढाई रुक गईे|

एक महीने तक जब खुसबू स्कूल नहीं गई तो स्कूल के  प्राचार्य ने पता लगाने की कोसिस की तो उन्हें बच्चो से सारी कहानी का पता लगा, प्राचार्य ने अपने स्कूल के  शिक्षक  के साथ कालू और उसके भाई बहनो को खुसबू के घर माफ़ी मांगने को भेजा,  सारा मामला सुलझाने के  बाद  खुसबू  वापिस स्कूल जाने लगी, सबको लगा जैसे कालू सुधर गया लेकिन ऐसा नहीं था अब तो वो और भी ज्यादा परेशान करता, लेकिन ये ध्यान रखता की कोई हादसा न हो !

अब दोनों आठवीं कक्षा में थे और अब भी कुछ बदला नहीं था लेकिन अब खुसबू बड़ी हो गई थी ये सब उसे अच्छा नहीं लग  रहा थे|

एक दिन बहुत गर्मी थी और धुप तो मानो जला ही डालेगा स्कूल  से लौटते समय उसे प्यास लगी  उसने जैसे ही थैले से अपना बोतल  निकला और पानी पिने लगी कालू ने  हाथ मार के  सारा पानी निचे गिरा दिए और बोतल खुसबू को देकर जोर-जोर से हसने लगा और कहा “और पानी पिओगी ?” इसबार  खुसबू को बहुत गुस्सा आया और उसने वही बोतल कालू क सर पे दे मारी, कालू  खुसबू को मरने  झपटा उसके हाथ से टकराया और “बाप रे बाप” कहते हुए दूर हुआ, समझ नहीं आया की क्या हुआ उसकी बहन ने पूछा तो वो चीखते हुए बोला, “नोच डाला रे….” उसके हाथ से खून निकल रहा था थोड़ी देर में समझ आया की खुशबु के नाख़ून बढे हुए थे और उसी से उसे लग गई, तीनो मिल के उसे मारने के लिए झपटे तो उसने भी डराया और मरना है आओ सबको नोच डालूंगी, उसदिन से खुसबू से वो कभी नहीं लड़ते थे क्यों की उसदिन के बाद उसने अपना नाख़ून काटना ही बंद कर दिया उसके नाख़ून ही उसका ताकत बना|

“कालू” इंजीनियरिंग करने “देहरादून” चला गया और खुसबू पास के ही सहर जाके सरकारी नौकरी की तैयारी करने लगी उसने बहुत मेहनत से “आई एस” की परीक्षा पास की और अपने ही इलाके की “आई एस अधिकारी” बन गईे|

उधर कालू ने तीन साल तक पढाई की लेकिन चौथा साल अभी बाकी ही था की अपने स्वभाव को बदल नहीं पाया और किसी से लड़ाई करके किसी को जान से मार दिया े| उसकी वजह से उसे पांच साल के लिए जेल हो गई उसका भविस्य ख़राब हो गया |

अब कालू अपने गांव के चौक पे “टी बी रिपेरिंग” का काम करता है और खुसबू उस इलाके की “आई एस अधिकारी” है दोनों कभी मिलते भी है तो कालू की नजर मारे शर्म के झुक जाती और खुसबू उसे ये ये सोच के निहारती है की भले अब वो कितना भी सुधर जाए लेकिन उसकी हरकतों ने खुसबू के मासूम बचपन को तबाह कर के रख दिया और “जैसी करनी वैसी भरनी” वाली कहानी याद कर के खुसबू कालू से उसका हाल-चाल पूछे बिना ही वहा से चली जाती है |

छीन लिया किसी ने बचपन तो क्या

जाने कितने बचपन अब संवारेगी वो……..,

अंगारे बनकर बढ़ चली है पाने मंजिल को

राहे पत्थरो से भी अब तो निकालेगी वो……..||

written by

priya shrivastava livepathshala

PRIYA SHRIVASTAVA
प्रिया श्रीवास्तव
छपरा, बिहार,

 

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