बनकर दिया तुम जलते रहो

बनकर दिया तुम जलते रहो
जग को जगमग करते रहो
हमेशा आगे बढ़ते रहो
खुद को पग-पग पर सोचते रहो
बनकर दिया तुम जलते ….!

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lamp

गर है भुजाओ में दम तुम्हारे
या भीतर तुम्हारे दमकल की पावक
है जूनून की वो ललक
बस तुम उसको चीरते चलो
बनकर दिया तुम …..!

जैसी सोच होगी तुम्हारी
वैसा ही पथ तुम बनाओगे
सोच को अपनी सदा ही
बढ़ाते चलो, बढ़ाते चलो
बनकर दिया तुम जलते…!

रौशनी स्वयं की बिखेरते चलो
दिन रात उसको तुम जपते चलो
आए कोई बाधा पथ में तुम्हारे
अडिग बनकर चलते रहो
बनकर दिया तुम जलते रहो….!

हो गर तुम इस धरा पर
तो जरा उभरते चलो
देकर किसी को रौशनी तुम्हारी
खुद की चमक बढ़ाते चलो
बनकर दिया तुम जलते …!

हितकारी पुरुषत्व हो तुम्हारा
जय जय जय हो राग तुम्हारा
उस पर भी तुम जय करते रहो
खुद को पग-पग पर सोचते रहो
बनकर दिया तुम जलते रहो….!!

 

Written by IMG-20160717-WA0006 Deepesh Kumar Sharma Deepesh Kumar Sharma is a writer (relative to natural lusture) he is persueing B.Sc. (computer science) from P.M.B.Gujrati Science College Indore (M.P.).

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