ऐ मुसाफिर तू चलता जा…

ऐ मुसाफिर तू चलता जा
तुझे तेरी मंजिल मिल जाएगी
जो कोई तुझको रोकेगा
कुछ बातें उसे समझ आएगी
ऐ मुसाफिर तू चलता जा…

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traveller 2

जब होगी तुझ पर
घनघोर अंधेरो की बरसाते
आएगी तुफानो की वो राते
उन मुस्कुराती आंधियो में भी
मजबूत खुद को करता जा
ऐ मुसाफिर तू चलता जा….

 

गम को सारे भूलकर
नया कुछ तू शुरुकर
हर मौसम में ढलकर
अपनी तू सुनता जा
ऐ मुसाफिर तू चलता जा….

traveler-1

जब होगी रजनी की शाम कभी
होगा उदय एक नया सवेरा
सोने वाला उठ जाएगा
रातो में नवजीवन सा आएगा
चाँद भी शर्माएगा
मन तेरा चंचलता दिखलाएगा
ऐ मुसाफिर तू चलता जा…

 

जब तू अपने कदम बढ़ाएगा
तारो का समूह तुझे
कोई नया नखत दिखाएगा
उड़ने वाला अक्सर यू ही घबराएगा
पत्तो में हलचल मचवाएगा
मन तेरा मुस्काएगा
ऐ मुसाफिर तू चलता जा…

 

तू राहो को अमर बनाएगा
मन को अपने महकाएगा
छिपी वादियो जैसे मुस्काएगा
जब दो राहो को तू पाएगा
एक भ्रम को यु अपनाएगा
सूरज बनकर नभ को चमकाएगा
अपना धीरज तू धरता जा
ऐ मुसाफिर तू चलता जा…

 

शीत की लुभावनी रातो में
चाँद की रोशनी भरी बातो में
पग पग तू अपना रखता जा
कामयाबी के उस आलम में
हिम्मतो के उस दामन में
रोज कोई नया सपना तू बनता जा
ऐ मुसाफिर तू चलता जा..

 

writtten by            deepesh_converted                                                                                         Deepesh  Kumar  Sharma

Deepesh  Kumar  Sharma is  a  writer (relative to natural lusture)  he is persueing B.Sc. (computer science) from P.M.B.Gujrati Science College Indore (M.P.).  

 

We  thanks to Deepesh  Kumar  Sharma   Ji for sharing his poetry with LIVEPATHSHALA , and wishing him all the best wishes for his bright future.

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