आज वही बचपन याद आ गया

आज वही बचपन याद आ गया…

जनम मरण के बंधन को
आज कोई तीर सा मिल गया
लहरो भरी हवाओ को
जैसे कोई सुर सा मिल गया
लगा कुछ ऐसा नवजीवन सा आ गया
आज वही बचपन याद आ गया…

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हुए घन भी घने
पराए भी बने अपने
विलोचन देखने लगे सपने
मगर उनमे भी कुछ
नवजीवन सा आ गया
आज वही बचपन याद आ गया….

 

भभक उठा सारा जगत देख मुझे
काल के उस मस्तक पर
अमरावती के उस दस्तक पर
खड़ा कोई देवराज जैसे
गम की बारिश हुई हो वैसे
उस घनेरे तिमिर में भी
कोई रोशनी अपनी ले बढे
लगा कुछ ऐसा नवजीवन सा आ गया
आज वही बचपन याद आ गया….

 

जब सुनी सुनी सी मग पर
कोई बटाऊ अपनी बात बतावे
निरकलुश मन भी अकलुष हो जावे
काँपने लगे सारा तम परिवेश
जब सविता (सूर्य) अपनी प्रभा बतावे
बन जाती कोई नई प्रभात जब
मानुष को बचपन याद आवे
जब चाँद भी शर्मा गया
लगा कुछ ऐसा नवजीवन सा मिल गया
आज वही बचपन याद आ गया……

 

 

उस नखत भरी रजनि को
देख मन ने यूं सोचा कभी
इस विचारो भरे पुष्कर (तालाब) को
पुस्तक समझकर पढ़ा कभी
दर्प भरे लोगो के मुख को
आज देख अन्तर भी मुस्कुरा गया
लगा कुछ ऐसा नवजीवन सा आ गया
आज वही बचपन याद आ गया….

 

Written by IMG-20160717-WA0006 Deepesh Kumar Sharma Deepesh Kumar Sharma is a writer (relative to natural lusture) he is persueing B.Sc. (computer science) from P.M.B.Gujrati Science College Indore (M.P.).

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